Friday, June 3, 2011

भीगें हैं नयना

काजल हैं तेरे बादल से घने
भीगें हैं ये नयना वर्षा तले
चमक तेरे आँखों की, बिजली सी है
बरस रहे हैं ये नयना, न जाने क्यों

है शीतल स्थिर सा, सब कुछ क्यों
बरस रहे जब ये नयना हैं वर्षा तले
है ये कैसी सुकून मीठी, मेरे दिल तू बता
बरस रहे जब ये नयना हैं वर्षा तले

बरस रहे जब ये नयना हैं वर्षा तले ...
बरस रहे जब ये नयना हैं वर्षा तले ...


जोनी 'डी'
३ जून २०११ 


भूख

भूख 

दो रोटी मैं भी खाता हूँ
दो रोटी वो भी खाता है

फर्क, बस इतना सा है... 

दो से ज्यादा मेरे पास नहीं है
वो दो से ज्यादा नहीं खा पाता

उसकी भूख दौलत से पूरी होती है
मेरी दौलत मेरी गरीबी है दुनियावालों

--- स्वरचित --- 
३ जून २०११ 


अर्ज है...


चल पड़ा अनजान राह पर ये मन 'डी' 
दिल न जाने, किस तलाश में है डूबा
सब कुछ था, कुछ पल पहले तक ठीक
यकायक ये कैसी उथल-पुथल है मन में 

--- स्वरचित ---

अर्ज है...

तेरे ही आगोश में हर एक को शुकून मिलता है 
ऐ मौत, तू ज़िन्दगी से खूबसूरत है क्यों 
न चाह कर भी हर कोई तेरे आगोश में सिमट जायेगा 
हर पल डर का मगर अहसास दिलाता है क्यों...

--- स्वरचित ---

Thursday, June 2, 2011

शबनम

शबनम की चमचमाती छोटी बूँदें 
झिलमिलाती अटखेलियाँ करती
लुप्त हो जाती है विहान के पल
एक ठंडी चादर भिखेर धरती पर 

वे नन्ही-नन्ही बूँदें किस कदर दे जाती है 
निस्वार्थ अहसास शकुन की, दुनिया को 'डी'  
पल, बस कुछ पल में इतना बड़ा कार्य कर गयी 
हम इंसान इन छोटी सी बूंदों से भी सीखे नहीं 


--- स्वरचित ---


प्रेरणा....

प्रेरित अच्छी कविता 'डी' करती है मुझको 
मस्तिष्क का घोड़ा दौड़ पड़ता है यकायक 
कलम फिर चल पड़ती है पन्नो पर यूँ..... 
कलाम खुद-ब-खुद नज्र कर देता हूँ फिर

--- स्वरचित ---


Wednesday, June 1, 2011

अर्ज है...

झिलमिलाता हुआ मुस्कान होटों पर
चाँद की चांदनी में 'डी' नज़र आये तुम
रात का सन्नाटा और वह पगडण्डी 
झील के शीतल जल पर चाँद का बिम्ब 
ज़िन्दगी कहाँ ले आई तू मुझे ये बता...

--- स्वरचित ---