Sunday, January 23, 2011

खुदा लापता है क्यों? (23rd Jan 2011)

खुदा लापता है क्यों?

ढूंढ रहा है हर शक्श इन्हें
जब से जहान आबाद हुआ
मिला भी अगर किसी से
खुद खुदा का बंद कहकर
इंसान ये मानने को तैयार नहीं हुआ,
खुदा है लापता ये सबको है पता

हर धर्म अपने ही ढंग से
खुदा का इबादत है करता
कोई नमाज़ अदा करके
तो कोई आरती करके
खुदा मगर बहरा तो नहीं
कि हर कोई बस यूँ ही शोर करता

बिकतें है इंसानों के बाजारों में
खुदा की तस्वीरें, पुतले और चीज़ें हज़ार
बदल गएं है इबादत का सलीखा
खुद खुदा के बनाये इस जहान में
लापता हो कर भी खुद खुदा
हर शक्श में है बसता

कोई माने या ना माने
खुदा है, ये सबको है पता
कैसा है खुदा, कौन है खुदा
नहीं पर कोई ये कह सकता
कोई भी चूकता नहीं मागने से
खुदा है कि सबको कुछ ना कुछ ज़रूर है देता

खुदा की खुदाई प्यार करने को है कहता
एक इंसान है कि खुदा की खुदाई पर ही झगड़ता
मर जाते है कई, मारे जाते है कई
हर वक़्त मगर खुदा ही बदनाम होता
खुदा अगर लापता नहीं होता
तो पता नहीं उनका अंजाम क्या होता?

--- स्वरचित --- 

Saturday, January 22, 2011

GARIB HONA... (23rd Jan 2011)

गरीब होना एक गुनाह है 
जिसे रोज मरना पड़ता है औरो के लिए...
अमीर बनते हैं इन्ही गरीबों के वजह से, मगर
हर खून का बूंद जब तक ये वहशी ना चूस ले
इन्हें चैन कहाँ... 



--- स्वरचित ---

अर्ज करता हूँ... (22nd Jan 2011)

अर्ज करता हूँ...

जहाँवाले अगर समझ जाये इसे!
मुश्किलें खुद-ब-खुद आसान हो जाये!!

मोहब्बत करनेवाले जो अमर हो चुके है इश्क के खातिर! 
अपने कब्र में बेसब्री के करवटें लेते होंगे आज की हालात देख कर!! 

ना समझ होकर हमने पहले इश्क किया
दर्द-ए-दिल को समझाया मगर धोखा खाया
हिम्मत किया, फिर से इश्क फ़रमाया समझ कर
इस बार भी दिल टूटा और संभल नहीं पाया 
दुनियावालों ने बहुत समझाया मगर
इस दिल का मैं क्या करूँ
जो हर पल और हाल में मोहब्बत चाहता है?

--- स्वरचित ---


Friday, January 21, 2011

अर्ज करता हूँ... (21st Jan 2011)

अर्ज करता हूँ...

आवाज़ मत देना अब मुझको तुम पीछे से!
न चाहते हुए भी बहुत दूर निकल आयें हैं अब!!

रुखसत तो किया नहीं तहे-ए-दिल से तुमने मुझको!
अब ये बेचैनी क्यों और फिर किसके लिए!!

तुम्हारा हाफना और कुछ न कह पाना, आँखें प्यार से भरी हुई!
तुम्हारे मोतियों को मैं ज़िन्दगी भर अपने दिल से लगा के रखूंगा!!

जा रहा हूँ मैं न चाह कर भी,
आज दर्द भर गया है इस दिल में!
जिस में हर पल प्यार बसा रहता था,
अब तो तन्हाई में ही तुमसे मिलता रहूँगा!!

--- स्वरचित ---






Wednesday, January 19, 2011

अर्ज करता हूँ... (20th jan 2011)

दर्द का आलम भी क्या आलम है 'डी'
जब बांटना सीख गए औरो की...
तो मिलता है सुकून इस दर्द-ए-दिल को...
बयां करें भी तो न समझ सकेगी ये दुनियावाले ...

--- स्वरचित ---

Sunday, January 16, 2011

स्कैम का दौर (16th Jan 2011)

स्कैम का दौर 

है कोई नेता ऐसा इस जहाँ में,
जो अपनी सफ़ेद खादी के पोशाक
की तरह बेदाग़ निश्चल हो
इस स्कैम के दौर में

हकीकत तो ये है कि
नेताओ की दौड़ में
कौन किस से आगे निकल जाये
डर है हर किसी को आज

मैं अगर नहीं खता हूँ
तो साला वो ज़रूर से खायेगा
फिर मेरा क्या होगा
मैं सत्यवादी हरिश्चंद्र तो नहीं

गरीबों का क्या है
थोड़े दिन चिल्लायेंगे और फिर
रोजमर्रा के भोझ तले
शांत हो कर दम तोड़ देंगे

सफ़ेद पोशाक के ये झोंक
ड्राकुला से भी है भयंकर
चाहे ये कभी खा न सके सारा दौलत
गरीबों का खून मगर चूसेंगे ये ज़रूर
 
--- स्वरचित --- 





अर्ज करता हूँ... (16th Jan 2011)

अर्ज करता हूँ...

लड़कड़ा हम गए तो क्या हुआ,
लड़कड़ा, हम गए तो क्या हुआ!
हम चलना थोड़े ही छोड़ देंगे 'डी'!!

उठ कर चलना हमारी मज़बूरी नहीं,
उठ कर चलना, हमारी मज़बूरी नहीं!
ये तो इस ज़िन्दगी का दस्तूर है!!

चोट खाता है हर कोई इस सफ़र में
चोट, खाता है हर कोई इस सफ़र में!
दर्द के बाद...
दर्द के बाद, एक अजब सा सुकून का अहसास है!!

--- स्वरचित ---